*1008 भगवान आदिनाथ जन्मजयंती पर निकली भव्य शोभायात्रा*

टीकमगढ़। 1008 पार्श्वनाथ धाम पंचायती जैन मंदिर से इस युग के प्रवर्तक प्रथम तीर्थंकर श्री 1008 भगवान आदिनाथ स्वामी के जन्मजयंती महाविश्व के पावन अवसर पर एक विशाल और भव्य शोभायात्रा धूमधाम से निकाली गई। यह शोभायात्रा माझमंदिर से प्रारंभ होकर शहर के प्रमुख मार्गों से होकर पपौरा चौराहा ,जेठ चौराहा, पुरानी नगर पालिका ,कटरा बाजार, लुकमान चौराया ,सेल सागर, गांधी चौराहा से राजेंद्र पार्क मानस मंदिर पहुंचकर संपन्न हुई।
धर्म प्रभावना समिति के अध्यक्ष नरेंद्र जनता ने बताया कि इस शोभायात्रा में आकर्षण का विशेष केंद्र रजत चांदी का दिव्य रथ था, जो पूरे मार्ग में श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित कर रहा था। विभिन्न मंदिर जी से आकर्षक विमान रथो पर विराजमान होकर जिन प्रतिमा, घोड़ा, बग्गी, दिव्या घोष ,धर्म ध्वजा लिए महिला मंडल, जैन आगम पाठशाला के बच्चे और बड़ी संख्या में श्रद्धालु जन मौजूद थे इसके साथ चल रही , नृत्य करती महिलाओं की टोली और सजाए गए घोड़ों ने शोभायात्रा की भव्यता को और बढ़ाया। समाज की महिलाएँ विशेष ड्रेस कोड में शांतिपूर्वक चलकर धार्मिक गरिमा का उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही थीं।
मार्ग में जगह-जगह समाजजन एवं विभिन्न दलों के जनप्रतिनिधियों ने शोभायात्रा का पुष्पवृष्टि से स्वागत किया। श्रद्धालुओं ने श्रीजी की आरती उतारी और “भगवान आदिनाथ स्वामी की जय” के जयकारों से सम्पूर्ण वातावरण धार्मिक उल्लास से गूंज उठा। संपूर्ण यात्रा शांतिपूर्ण एवं अनुशासित ढंग से सम्पन्न हुई।
मानस मंच पर भगवान का अभिषेक किया गया और मुनि श्री 108 विवौधसागर जी महाराज का आशीर्वाद और मंगल देशना का लाभ श्रद्धालु जनों को प्राप्त हुआ
यह समस्त कार्यक्रम में प्रभारी नगर निरीक्षक रवि भूषण पाठक सहित समस्त स्टाफ की भूमिका सराय नीय रही
इस भव्य आयोजन ने पूरे शहर में आध्यात्मिक ऊर्जा और धार्मिक सौहार्द का अद्भुत संदेश प्रसारित किया।
जनता जी ने भगवान आदिनाथ जन्म जयंती —का एक संक्षिप्त व महत्वपूर्ण परिचय देते हुए बताया की
भगवान आदिनाथ, जिन्हें ऋषभदेव के नाम से भी जाना जाता है, जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर हैं। उनकी जन्मजयंती को जैन समाज अत्यंत भक्ति, श्रद्धा और उत्साह से मनाता है। यह दिन आध्यात्मिक जागरण, अहिंसा, तप, योग और सदाचार के सिद्धांतों को पुनः स्मरण करने का अवसर माना जाता है।
भगवान आदिनाथ का जन्म
स्थान: अयोध्या नगरी
माता-पिता: नाभिराज और मरुदेवी
भगवान आदिनाथ जैन परंपरा के अनुसार सत्रह महान गुणों से विभूषित जन्मे थे।
जन्म के समय 16शुभ स्वप्न प्रकट हुए, जिन्हें अत्यंत मंगलकारी माना जाता है
भगवान आदिनाथ का जीवन व योगदान
1. प्रथम तीर्थंकर के रूप में
भगवान आदिनाथ ने मानव समाज को जीवन के आवश्यक मूल सिद्धांत सिखाए और सभ्यता के जनक माने जाते हैं।
उनका जीवन दो प्रमुख चरणों में विभाजित है:
*गृहस्थ जीवन*
दीक्षा एवं ज्ञान का मार्ग
2. समाज में व्यवस्था की शुरुआत
उन्होंने मानवों को—
खेती करना
खाना पकाना
वस्त्र पहनना
पशुपालन
लेखन-पठन
कला और शिल्प
जैसे अनेक कौशल सिखाए
इसी कारण उन्हें “नरश्रेष्ठ” और “आदि गुरू” भी कहा जाता है।
*दीक्षा और तप*
गृहस्थ जीवन का त्याग कर उन्होंने कठोर तप किया और केवल ज्ञान (सर्वज्ञता) प्राप्त की।
इसके बाद उन्होंने धर्म का प्रचार किया और जैन तीर्थ (संघ, साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका) की स्थापना की
*जन्मजयंती क्यों मनाई जाती है?*
भगवान के सिद्धांतों—
अहिंसा, सत्य, तप, त्याग, संयम—के प्रसार के उद्देश्य से।
धार्मिक कार्यक्रमों के माध्यम से समाज में सकारात्मक ऊर्जा और नैतिक प्रेरणा लाने के लिए।
शोभायात्रा, भक्ति, जप, पाठ और पूजा के द्वारा आध्यात्मिक उत्सव का अनुभव करने के लिए
जन्मजयंती के प्रमुख आयोजन
भगवान आदिनाथ की शोभायात्रा
मन्दिरों में अभिषेक, पूजा, शांतिधारा
भक्तामर पाठ, स्तोत्र वाचन
सांस्कृतिक व धार्मिक कार्यक्रम
समूचे शहर में जयकारों, पुष्पवृष्टि और सजावट का आयोजन
भगवान आदिनाथ का संदेश
धर्म का पहला आधार अहिंसा
जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य मोक्ष
अनुशासन, तप और संयम का मार्ग
समाज में प्रेम, शांति और सद्भाव और विश्व शांति बनी रहे
पत्रकार रामजी तिवारी मड़ावरा
चीफ एडिटर टाइम्स नाउ बुन्देलखण्ड
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