श्रद्धा-ज्ञान-आचरण की त्रिवेणी से ही मोक्ष संभव : मुनिश्री सौम्य सागर महाराज

महरौनी,ललितपुर।
गणाचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनिश्री सौम्य सागर महाराज एवं मुनिश्री जैयन्त सागर महाराज का नगर में मंगल प्रवेश हुआ। मुनिसंघ के आगमन पर जैन समाज सहित धर्मप्रेमी नागरिकों में विशेष उत्साह देखने को मिला। श्रद्धालुओं ने जगह-जगह भव्य आगवानी की तथा द्वार-द्वार पाक्षप्रच्छालन कर मुनिराजों का आशीर्वाद प्राप्त किया।
नगर में आयोजित धर्मसभा में मुनिश्री सौम्य सागर महाराज ने प्रवचन देते हुए कहा कि सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र—इन तीनों की एकता ही मोक्ष का मार्ग है, जिसे जैन दर्शन में रत्नत्रय कहा गया है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि जैसे लड्डू बनाने में बेसन, घी और बूरा का संतुलन जरूरी है, वैसे ही आत्मा के उत्थान के लिए श्रद्धा, ज्ञान और आचरण का सामंजस्य अनिवार्य है।
मुनिश्री ने कहा कि मोक्ष का वास्तविक अर्थ कर्मों के बंधनों का क्षय और आत्मा का अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित होना है। उन्होंने बाहरी आडंबरों से बचकर आत्मनिरीक्षण, संयम और सतत साधना पर बल दिया।
धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और मुनिवचनों का श्रद्धापूर्वक श्रवण कर आत्मिक लाभ प्राप्त किया।
पत्रकार रामजी तिवारी मड़ावरा
चीफ एडिटर टाइम्स नाउ बुन्देलखण्ड
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