निर्मल मन में ही प्रभु का वास – स्वामी बालभरत जी महाराज

ललितपुर। श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ के चतुर्थ दिवस पर आयोजित कथा में व्यासपीठ से प्रवचन करते हुए स्वामी बालभरत जी महाराज ने कहा कि प्रभु का वास केवल निर्मल और पवित्र मन में ही होता है। जब हृदय में सच्ची आस्था और श्रद्धा जागृत होती है, तभी भगवान की कृपा प्राप्त होती है। उन्होंने कहा कि भगवान पदार्थों के नहीं बल्कि भाव के भूखे होते हैं।
स्वामी बालभरत जी ने कहा कि निर्मल हृदय की भक्ति ही भगवान श्रीकृष्ण को विदुर के घर साग खाने के लिए विवश कर देती है। इसी प्रकार राम अवतार में प्रभु श्रीराम प्रेमवश होकर शबरी के जूठे बेर स्वीकार करते हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे अपना निर्मल मन भगवान को अर्पित करें। सत्य, अहिंसा, दया और परोपकार जैसे गुणों को अपने जीवन और आचरण में स्थान देना ही सच्ची भक्ति है।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने बताया कि जब महाराज परीक्षित श्राप से ग्रसित हुए तो उन्होंने गंगा तट पर ऋषियों के साथ श्रीशुकदेव जी महाराज से श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण किया। उसी कथा श्रवण से उन्हें मुक्ति प्राप्त हुई। उन्होंने कहा कि भगवान की कथा अमृतमयी है और उसका श्रवण मानव जीवन को पवित्र बनाता है।
कथा के दौरान सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए स्वामी जी ने मनु और शतरूपा के प्रसंग की विस्तृत व्याख्या की। उन्होंने बताया कि तृतीय स्कंध में सांख्य योग का विस्तृत वर्णन मिलता है और ऋषियों की संतति ही सनातन संस्कृति की आधारशिला है। उन्होंने कहा कि जहां-जहां सती माता के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई।
स्वामी जी ने सुनीति और सुरुचि की कथा का उल्लेख करते हुए बताया कि सुनीति सदाचार और अनुशासन का प्रतीक है, जबकि सुरुचि स्वेच्छाचारिता को बढ़ावा देती है। आज समाज में बढ़ती स्वेच्छाचारिता हमारे संस्कारों को कमजोर कर रही है। उन्होंने कहा कि सुनीति के पुत्र ध्रुव ने अपनी अटूट भक्ति से परमात्मा का साक्षात्कार किया और अमरता को प्राप्त किया।
इस अवसर पर महंत रामबालक दास जी महाराज, महंत सूर्यप्रकाश दास जी महाराज, महंत विष्णुदास जी महाराज, कल्याण सिंह यादव, अजय जैन, धर्मेंद्र रावत, सोनू चौबे, वॉवी राजा, रमेश सोनी, भगवत नारायण बाजपेयी, जगभान राजपूत, दीपक राठौर सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
पत्रकार रामजी तिवारी मड़ावरा
चीफ एडिटर टाइम्स नाउ बुन्देलखण्ड
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